ठहरे वक्त पर चलना

ठहरे वक्त पर चलना
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जैसे देह पर पड़ता सुनहरा धूप
वैसे ही होता है
रह-रहकर उठता खलिहान में
गांव की रतनी मां के हाथों का सूप,

जैसे बढ़ते सूरज के साथ-साथ
आंगन में धीरे-धीरे सरकती रोशनी
वैसे ही होती है
सूरज के उगने से पहले
भोर के घने अंधेरे को साफ करती
कंदना मां की लटको घांस की बढ़नी,

जैसे आकाश की सिंदूरी रंग का
जाने कब कई रंग घोल लेना खुद में
वैसे ही होता है
हथेली के कसाव को महसूसना
बड़ी जतन से खेत जोतते वक्त
बिरसा के बाबा का हल की मुठ में,

जैसे शाम का
अंधेरा घिरने से पहले
अपने आंचल में सारे रंगों को समेट लेना
वैसे ही होता है
गांव में बुझे चुल्हे के चारों ओर
गीत सुनते हुए सलगी के बच्चों का
पटिया में खुद को लपेट लेना,

जैसे कोयल नदी के पानी का
देर रात तक चांदनी में हहराना
वैसे ही होता है
गांव के बच्चों का चट्टानों पर से
खिलखिलाते हुए मंगरदाह में छलांग लगाना,

जैसे धरती निरंतर चलती है
एक खामोशी के बीच
जैसे सांसे देह में बहती है
एक बेहोशी के बीच
जैसे लगता है
सन्नाटा चारो ओर पसरा है
जैसे लगता है
गांव में वक्त आकर ठहरा है,

भागती-दौड़ती शहर की जिंदगी से दूर
धरती की तरह, आकाश की तरह
ठहरे वक्त में गांव के लोग चलते हैं
जीवन चलता है बिना दौड़े,

बिना किसी को रौंदे
और उनके साथ
उसी ठहरे वक्त में सूरज भी ढलते हैं
धरती चलती है.............
सांसे चलती है और मौसम बदलते हैं।।

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जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 30.06.2014

( गांव की मिट्टी में सने पैर जब धीरे-धीरे उठते हैं तो महसूस होता है कदमों के साथ और भी कुछ धीरे-धीरे सरक रहा है शायद जमीं, शायद वक्त। या शायद वक्त जैसे निरंतर चलते चलते थक गया हो और गांवों में
आकर ही ठहर जाता हो। उसी ठहरे वक्त पर निरंतर श्रम करते गांव के लोग चलते रहते हैं।
जैसे महसूस नहीं होता पर धरती चलती है, सांसे चलती हैं, वैसे ही उनका जीवन चलता है बिना दौड़े,
बिना किसी को रौंदे.......)


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