आदिवासी विमर्श : परंपरा के पुनर्पाठ की जरुरत
-डॉ. मनोज पांडेय
आदिवासी का शाब्दिक अर्थ है- आदिम युग में रहने वाली जातियां। मूलत: यह वे जातियां हैं जो 5000 वर्ष पुरानी भारतीय सभ्यता को संजोये हुए हैं। यह भी प्रमाण मिलता है कि, औपनिवेशिक युग के पूर्व आदिवासियों की अपनी स्वतंत्र सत्ता थी। जल, जंगल, जमीन और प्रकृति के संसाधनों पर उनका अधिकार था। परन्तु जैसे-जैसे साम्रायवादी ताकतें बढ़ती गईं, औपनिवेशिक सत्ताएं मजबूत होती गईं, वैसे-वैसे आदिवासियों का शोषण और उन पर अत्याचार बढ़ता गया। उनके संसाधनों पर जबरन कब्जा किया जाने लगा, उन्हें अपनी जमीन से बेदखल किया जाने लगा। यह भी कि अपनी स्वायत्ता और अस्मिता के लिए जितना और जिस व्यापक पैमाने पर आदिवासियों ने विद्रोह किया, उतना देश के किसी अन्य तबके ने नहीं किया। पूर्वोत्तर में सात रायों का गठन और कुछ ही वर्षों पूर्व झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड (सभी आदिवासी बहुल) का गठन आदिवासी अस्मिता की लड़ाई का सबूत है। स्वतंत्र भारत के संविधान में भी आदिवासी समुदाय के लिए ढेरों योजनाएं बनाई गर्इं, उनकी कला को तो तथाकथित सभ्य समाज ने सराहा, परन्तु दुर्भाग्यवश उनकी सभ्यता और संस्कृति को समझने, उनके अधिकारों के औचित्य को समझने का प्रयास न के बराबर हुआ। परिणामस्वरूप संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद इस समुदाय की समुन्नति का सपना साकार नहीं हो सका।
यह हकीकत है कि इस धरा का मूल निवासी (इंडीजिनस) आदिवासी होने के बावजूद तथाकथित सभ्य समाज की बर्बरता से यह समुदाय जंगलों, कंदराओं की ओट में रहने के लिए विवश रहा। प्रकृति से साहचर्य स्थापित कर यह समुदाय जल, जंगल और जमीन के किसी कोने में दुबका रहा। विकास और सुविधा-संसाधन से वंचित रहा। परंतु दर-ब-दर विस्थापित होने के बावजूद इस समुदाय ने अपनी संस्कृति, सभ्यता, भाषा को कभी त्यागा नहीं। लाभ-लोभ की प्रवृत्ति से दूर रहकर आदिवासी समुदाय ने सदियों से जंगलों में कंद-मूल खाकर, पोखरों, झरनों का पानी पीकर जीवनयापन किया- पूरे आत्माभिमान सहित अपनी भाषा, सहित और जीवन-शैली को जिन्दा रखते हुए।
लगातार शोषण और विस्थापन के शिकार रहने के कारण ही इस समुदाय में आक्रोश का भाव तीव्र होता रहा। जैसे-जैसे आदिवासी वर्ग शिक्षा और नागरी परिवेश से परिचित हुआ, उसे अपने मूल्य और वजूद का एहसास सालने लगा। आदिवासी अपने को छला हुआ, विकास की मुख्यधारा से वंचित और समाज का बहिष्कृत हिस्सा समझने लगा। उसमें अपने शोषण का बोध जैसे-जैसे बढ़ता गया, वैसे-वैसे उसने सभ्य जातियों के अत्याचार के विरुध्द बगावत का रास्ता अख्तियार किया। आदिवासी साहित्य में विद्यमान वेदना, पीड़ा, आक्रोश का भाव इसका प्रतीक है।
गौरतलब है कि अपनी उपेक्षा और अन्याय के विरोध में आदिवासी समुदाय प्रतिरोध करता रहा है। देश के अनेक हिस्सों में आदिवासी विद्रोह की लम्बी परम्पराएं रही है। मिशन विद्रोह जैसे आंदोलन से आदिवासी समाज की तड़प, बेचैनी और संघर्ष का अंदाजा लगाया जा सकता है। तीर और कमान आदिवासी की पहचान रहे हैं, आज यह पहचान कलम की शक्ति के रूप में उद्धाटित हो रही है। जैसे-जैसे जागरुकता और चेतना बढ़ रही है, ज्ञान की रौशनी से जंगलवासी परिचित हो रहे हैं, वैसे-वैसे उनमें अपने स्वत्व का बोध और अस्मिता का भान दृढ़ होता जा रहा है। जीवन के बुनियादी हकों के लिए वे संगठित हो रहे हैं, कलम की ताकत उनके संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। आज आदिवासी लेकन अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक विशिष्टताओं का उद्धाटन कर उस समूची व्यवस्था को प्रश्नांकित कर रहा है जिस पर सभ्य कही जाने वाली सभ्यता गुमान करती रही है। यह भी कि, यह विमर्श समूची सांस्कृतिक परम्परा के पुनर्पाठ की आवश्यकता भी जता रहा है।
आज का आदिवासी विमर्श अस्तित्व और अस्मिता का विमर्श है। यह ऐसा विमर्श है जिससे इस समुदाय की परंपरा, रूढ़ियां, संस्कृति, अन्याय, अत्याचार, अपमान, शोषण सभी कुछ बयान हो रहा है। लोककला, संगीत, नृत्य, संस्कृति, भाषा, बोली, लिपि आदि विभिन्न धरातलों पर आदिवासी लेखन एक व्यापक विमर्श का हिस्सा बन रहा है। चूंकि इसकी लिपि और भाषा को लम्बे अरसे तक पहचान ही नहीं मिल सकी इसलिए उनका संरक्षण और विकास भी बाधित हुआ। प्रतिष्ठित मराठी आदिवासी साहित्यकार वाहरू सोनवणे का यह कहना ठीक है कि लिखित ही केवल साहित्य होता है यह कहना ही आदिवासियों की दृष्टि से असंगत है। साहित्य और कला, साहित्य और जीवन के बीच जो दीवारें समाज में खड़ी हैं, उन दीवारों का आदिवासी समाज में कुछ भी स्थान नहीं है। इन व्याख्याओं को बदलना जरूरी है क्योंकि आज आदिवासी समाज में कई प्रथाएं लोकगीत और नाटक तथा अनेक अन्य कलाएं विद्यमान हैं जिसे शब्दबध्द नहीं किया गया है। हजारों वर्षों से चली आ रही परंपराएं कभी थमी नहीं। वे परम्पराएं आज भी मौलिक रूप में आदिवासी जीवन का अभिन्न अंग रही हैं। फिर इसे साहित्य कैसे नहीं कहेंगे। ऐसी दलीलें इस बात की आवश्यकता जता रही हैं कि आदिवासी साहित्य को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है।
यह एक प्रश्न के तौर पर चर्चा का विषय रहा है कि आदिवासी साहित्य क्या है? कारण यह कि इस साहित्य के बहाने जो तथ्य सामने आ रहे हैं उसमें सभ्य समाज की बर्बरता, अमानुषिकता का उल्लेख मात्र नहीं है अपितु मानव सभ्यता के इतिहास की जमीनी हकीकत को मटियामेट करने की कहानी भी अभिव्यक्त हो रही है। प्रसिध्द आदिवासी विमर्शकार डॉ. विनायक तुकाराम के अनुसार, ''आदिवासी साहित्य वन संस्कृति से संबंधित साहित्य है। आदिवासी साहित्य उन वन जंगलों में रहने वाले वंचिताें का साहित्य है जिनके प्रश्नों का अतीत में कभी उत्तर ही नहीं दिया गया। यह ऐसे दुर्लक्षितों का साहित्य है जिनके आक्रोश पर मुख्यधारा की समाज व्यवस्था ने कभी कान ही नहीं धरे। यह गिरि, कन्दाराआें में रहने वाले अन्याय ग्रस्तों का क्रांति साहित्य है। सदियों से जारी क्रूर और कठोर न्याय व्यवस्था ने जिनकी सैकड़ों पीढ़ियों को आजीवन वनवास दिया, उस आदिम समूह की मुक्ति का साहित्य है- आदिवासी साहित्य।''
आदिवासी साहित्य जीवनवादी साहित्य है। इसमें लक्षित विद्रोह जीवन के बुनियादी हकों से महरूम करने वाली व्यवस्था के विरोध की अभिव्यक्ति है। आदिवासी समाज की मुक्ति के लिए संघर्षरत आदिवासी वीर पुरुषों का राजनीतिक, सामाजिक विद्रोह इसकी मूल प्रेरणा है। यह साहित्य केवल, शब्दबध्द रचना नहीं है बल्कि मुद्दों पर आधारित, शोषित, उपेक्षित, बहिष्कृत वर्ग की आवाज उठाने वाला प्रतिबध्द, परिवर्तनकामी और संकल्पबध्द साहित्य है। प्रस्थापितों का यह साहित्य परिवर्तनकामी है, क्रांतिकारी है। इसमें प्रतिरोध का भाव है, विरोध का माद्दा है। अस्वीकार का साहस है। स्वीकार की दलीलें हैं। अनुभव की पूंजी है। आदिवासियों के बारे में इतिहासवेत्ताओं, समाजचिन्तकों, साहित्यकारों ने सैकड़ों वर्षों से जो कलुषित धारणाएं बना रखी थीं उसके प्रति तीव्र प्रतिरोध का भाव आदिवासी लेखन में प्रकट हो रहा है। लेखन की कविताओं, कहानियों में व्यवस्था विरोध और हिन्दू संस्कृति के प्रति जो विरोध का भाव है, उसका कारण यही है, और यही वजह है कि आदिवासी लेखन में वे मिथक, बिम्ब, प्रतीक प्राय: नहीं मिलते जो कि तथाकथित सभ्य और सुसंस्कृत साहित्यिकों के लेखन के हिस्से हैं। बनिस्बत इसके इनके लेखन में जंगल है, केंचुआ है, मिट्टी है, पक्षी हैं, पेड़-पौधे हैं, सूर्य चन्द्रमा है, पानी, बिजली, झरने, पोखर हैं।
आदिवासी विमर्शकार राजाराम भादू ने भी कहा है, ''आदिवासी साहित्य के उद्भव और परिप्रेक्ष्य निर्माण में मराठी के दलित साहित्य के संबंध को जोड़कर दखा गया है जो सही भी है, लेकिन आदिवासी अस्मिता और उनकी संघर्ष-धर्मी चेतना के विकास और प्रतिरोध संगठनों के निर्माण में नक्सलवादी आंदोलन के प्रेरणा प्रयासों को वहां लगभग नजरअंदाज कर दिया गया है। जबकि तेलंगाना-तेभागा आंदोलन से ही आदिवासी स्त्री-पुरुषों की गोलबंदी आरंभ हो गयी थी। यह प्रक्रिया नक्सलवादी श्रीकाकुलम, दण्डकारण्य और भोजपुर में आगे परवान चढ़ी और भयंकर दमन और उत्पीड़न के बावजूद आज भी आदिवासी अंचलों में फैलती जा रही है।''
बेशक आदिवासी अंचलों में नक्सली आंदोलन के उभार को भी इस पृष्ठभूमि में देखना जरूरी है। यह विचारणीय है कि आखिर क्यों आदिवासी 'नक्सली' बनने पर मजबूर हो रहा है? बहरहाल, आदिवासी विमर्श के मुद्दों और पृष्ठभूमि की पड़ताल के साथ यह माना सकता है कि इससे वंचित, बहिष्कृत समुदाय की चेतना को केन्द्र में लाने की पहल हो रही है। समय और समाज की स्थिति को देखते हुए यह स्वीकारना होगा कि वर्ण, वर्ग, जाति, लिंग भेद की दूरियों को पाटकर ही सामाजिक न्याय व्यवस्था और समुन्नत समाज की स्थापना हो सकती है।
-संकलित
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