अपने आसुओं को रखूंगी सहेज कर...
अपने आसुओं को रखूंगी सहेज कर
कि अंधेरी रातों में भी
चमकें वे हजारों जुगनू बनकर
जिनकी मद्धम रोशनी में निकलेंगे
कुछ योद्धा इस अंधेरी सुंरग में रास्ता तलाशने
सुरंग के मुहाने तक
जहां बसा है रोशनी का जंगल
उजाले से दिपदिपाता
और लौटेंगे लेकर अपने साथ
बहुत सारी नन्ही चिंगारियां
जिनसे रोशन होंगी
सदियों से अंधेरों में डूबी राहें
और टूटेंगी अंधकार की निरन्तरता
और उन कांटों भरी पगडंडियों पर भी
खेलेंगे कूदेंगे हमारे बच्चे
कंकड़ और कांटों के बीच भी
बिना घायल हुए या चोट खाए हुए
मेरे विलाप भरे गीत
गूजेंगे जंगल भर में
किसी दिन हर पेड़ की कोमल टहनियों
और नव पल्लवों की
मद्धम रुनझुन बनकर
मैं समेटूंगी पसीने की एक एक बूंद
जो बरसेंगी किसी दिन हम सब पर
पुरखों का आशीष बनकर
मैं रखूंगी अपने गुस्से को भी बचाकर
कि बुझती राख में से भी
चिंगारी बची रह जाए कोई
फ़िर से मशाल बन
राह दिखाने को
...
...
डोरोथी/ उज्जवला ज्योति तिग्गा

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