दूसरो के आईंने में आदिवासी समाज

दूसरों के आईने में आदिवासी समाज

दुनिया के रंगमंच पर सभी समाजों का प्रतिनिधित्व नजर आता है, पर आज भी आदिवासी समाजों की आधी अधूरी तस्वीर ही उपलब्ध है जो कि उनकी सच्चाईयों के साथ पूरी तरह से न्याय करने में असमर्थ है. उन आधी अधूरी तस्वीरों के आधार पर उकेरी गई
छवि आदिवासी समाज को फायदा पहुंचाने की बजाय
ज्यादा नुक्सान ही पहुंचाती है. लोकमानस में मौजूद
अर्धसत्यों के भंवरजाल में आदिवासी समाजों की सच्चाईयां विलीन हो जाती हैं और लोक चेतना में से बडी ही खामोशी से ओझल भी हो जाती है।

जब कभी भी हम दूसरों के दर्पणों में या आईने में हम
अपनी छवि या तस्वीर देखने का प्रयत्न करते है तो वे हमेशा ही हमें धूमिल, कुरूप, कालिमायुक्त और बेहद ही डरावने दिखाई देते हैं, जिन्होंने हमेशा हमें जंगली बर्बर और असभ्य समाज के रूप में ही देखा है।

उन खौफनाक छवियों का हम पर इतना गहरा आतंक
छाया होता है कि हम दुबारा पलटकर उन्हें देखना गवारा नहीं करते. हम अपनी मलिन छवियों की भयंकरता से आतंकित और त्रस्त होकर दर्पणों में अपनी छवियों को निहारने से भी गुरेज करने लगते हैं।

हमें ऎसा लगता है कि शायद हम में ही कोई कमी है वर्ना बाकी सब कुछ तो उस दर्पण में साफ स्पष्ट नजर
आता है।

पर हम इस बात को भूल जाते हैं कि दूसरों का दर्पण, उनके सोच, पूर्वाग्रहों, जीवनमूल्यों का सम्मिश्रण होता है जो कि उनके किसी खास सोच या बात को दर्शाने मात्र के लिए ही प्रयुक्त होता है।

ऎसा दर्पण खुद से भिन्न, अलग और नई
सच्चाईयों को प्रतिबिम्बित करने के लिए डिजाईन ही नहीं हुआ है।

अपनी खास सीमित दायरे के परे ऎसा दर्पण अगर कुछ
भी दिखाने का प्रयास करेगा तो वो धुंधला, मलिन और
कालिमायुक्त ही नजर आएगा।

आवश्यकता इस बात की है कि हम उन कमियों और पूर्वाग्रहों के मायाजाल से बाहर निकलें और अपनी छवियों को देखने के लिए नई अंतर्दृष्टियों से युक्त नए दर्पणों का निर्माण करें जो कि हमारी अपनी कसौटियों और मापदंडों को दर्शाता है ताकि हम दूसरों के द्वारा तय किए गए मापदंडों और पैमानों पर खरा उतरने की कोशिशों में अपनी तमाम जिन्दगी न्यौंछावर करने की अपेक्षा अपने मापदंडों और प्रतिमानों का निर्माण और विकास करें ताकि आने वाले समयों में हमारा समाज अपनी छवि दूसरों के द्वारा उधार में दिए गए दर्पणों में देखने की जिल्लत और अपमान से बच जाए।



हमारा आदिवासी समाज अपनी धूमिल और मलिन अपमानजनक छवियों के आतंक और यन्त्रणा से उबरकर अपने मापदंडों और प्रतिमानों पर खरी उतरती सम्मानजनक छवियों पर गर्वान्वित अनुभव करने के अवसरों को समझना और ढूंढना सीखें और दुनिया के सामने अपनी विकृतिपूर्ण असंगतियों से भरी कुरूप छवियों की बजाए एक सही तस्वीर प्रस्तुत कर सकें।

-उज्जवला ज्योति तिग्गा


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