टूटे पात्रों में...
टूटे पात्रों में
रोज ही उंडेला जाता है
स्वर्ग से ओस सा
आनंदमय आशीष
टूटे पात्रों में
कुछ भी नहीं टिकता
दुख बह के निकल जाता है
आनंद खुश्बू सा उड़ जाता है
सुख दुख समेटने बांटने
मे गुजर जाते है दिन
मिलते है हम लोग
आपस में
अपने सुख दुख लिए
टूटे पात्र भी
कभी रीते नहीं होते
हर पल उमड़ते
छलकते रहते है
...
...
डोरोथी/ उज्जवला ज्योति तिग्गा
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