महारानी दुर्गावती

विश्व इतिहास के पन्नों में महारानी दुर्गावती के बारे में
विद्वानों की टिप्पणी :-

1 इतिहासकार अबुलफजल "आइने अकबरी" में फारसी में लिखा फरिस्ता अकबर नामा में - "महारानी दुर्गावती गोंडवाना साम्राज्य की अति धीर वीर पराक्रमी विश्व की प्रथम विरांगना बहादुर महिला पैदा हुई थीं । उसके समान न पहले कभी थीं , न बाद कभी हो सकीं।''

2 कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया में लिखा है -
महारानी दुर्गावती गोडवाना साम्राज्य के सम्राठ संग्राम शाह के बाद महान रानी थीं । उसने महाराजा संग्राम शाह के सोने के सिक्के को ही चलाया । उसने कुशलता से 15 साल तक सत्ता की बागडोर सम्भाले रखी ।

3 इतिहासकार - फप्टन डब्ल्यू . एच . स्लीमैन लिखता है -
महारानी दुर्गावती गोडवाना साम्राज्य का संचालन इस
कुशलता से संचालन किया कि उस वंश के पुरुषो को पीछे छोड़ दिया ।

4 इतिहासकार स्मिथ लिखते हैं इस महान राज्य की सुघड़ व्यवस्था को विश्व के क्षितिज पर पहुंच कर अमर कर दिया । हाथियों के राजा (सफेद हाथी) सरवन, महारानी का प्रिय सवारी था ।

5 केम्ब्रिज हिस्ट्री में लिखा है -
गोडवाना साम्राज्य 36 हजार वर्ग कि.मी. भू भाग में था । महारानी के पास 120 हज़ार पैदल , 20 हजार घुड़सवार , 3 हजार हाथी थे । प्रत्येक किले में किलेदार के पास एक हजार पैदल और सौ घुड़सवार, दस बीस हाथी रहते थे । जय बेली नगर (जबलपुर) में मदन महल और गढ़ा में संग्रामशाह के बादल महल, जिसका भग्नावेश बाजना मठ आज भी है तथा अन्धेर देवेका महल में आवास रहता था ।

मदन महल के बारे में कवि और एक तांत्रीक ने ये
पंक्ति लिखा है -
''मदन महल के छांव में दो टांगो के बीच ,
गढ़ा धन नवलाख की दो सोने की ईंट । ''

6 अंग्रेज आई . सी . एस . ने नरई नाला में
महारानी की समाधी में श्रद्धांजली अर्पित करते हुये सफेद पत्थर चड़ाकर यह कविता लिखी ।

'' The kingdom of the gonds is gone ,
But noble memories remaine,
and with a loving able the con
the battle page which ends they reign ''

7 . इतिहासकार कर्नल इस्लीमैन ने लिखा -
नरई नाला में दुर्गावती के समाधी में पत्थर चढ़ाते वक्त हाथ में धरे पत्थर फरकने लगता है ।
ठांव बाहा खां सब थावें जित है उनका चौरा ,
हात जोड़त हो फरकत लगे बे खौरा ॥

जहां रानी की समाधी है उस पर बुंदेलीखंडी बोली कवि का उदगार -
महारानी दुर्गावती अपने जीवन काल में कला साहित्य
और विद्वान का सदा आदर करती रहीं । उसने प्राकृत ,
गोडी खड़ी बोली का विकास किया । महारानी के
दरबार में महेश ठाकुर रघुनंदन दमोदर ओझा गोविन्द
विश्वास भावे विद्वान थे । दुर्गावती के दरबार में महापत्रा और गोप महापत्र अकबर के दरबार से आये थे ।
इन्होने सम्पूर्ण राज्य में अतिथी भ्रमण किया तथा शोध
किया । दरबारी कवि - जयगोविंद केशव दीक्षित रानी के दरबारी कवी मे से थे । भारतीय इतिहासकार साहित्यकारो ने और प्रशंसको ने महारानी के बारे मे लिखा । मंडला , जबलपुर सागर नरसिंग पुर के गजेटियर सी पी एण्ड बेरार में सन् 1909 के सरकारी रिकार्ड में लिखा है । इसके पूर्व ऐसी वीरांगना महिला का जन्म इस दुनियां में नही हुआ
था ।


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