रोज सुबह निकलने वाला सूरज हमेशा पुराना वाला सूरज नहीं होता है वह अपने साथ नयी रोशनी लेकर आता है। नयी सुबह की नई रोशनी से आदिवासी गॉंव भी अछूते नहीं रहे और गॉवों से ग्रामीण शहरों और कस्बों में जाने लगे और वहॉं से वापसी में वे अपने साथ कुछ रूपये पैसे और नये कपडे ही नहीं बल्कि नयी सोच, नयी विचारधारा, परंपरा और आचार-व्यवहार भी लाने लगे।
ऐसे वक्त में हमें हमारी संस्कृति के लिए आगे आना चाहिए। हमें अपनी संस्कृती जमाने के सामने रखनी है। इन्हें इसकी महानता की पहचान करानी है। इसमे पढ़े लिखे युवाओं को बहुत काम करना होगा।
महाराष्ट्र के युवा साथी आज एकजुट है। यही जज्बा हमें कायम रखकर आगे इससे अपनी समाज की जनजागृति के लिए महत्त्वपूर्ण काम करने है।
अगर आज हम इसे नजरअंदाज करते है, तो आगे जाकर हम अपनी पहचान खो देंगे।
तो चलो आओ मिलकर संस्कृति के इस दीप से समाज को निरंतर जागृत करे।
विद्रोही
मी आदिवासी....गर्व आदिवासी
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