ये आदिवासी बहोत बोलने लगे है।- पलाश विश्वास

राजस्थान में तमाम किले आदिवासियों के ही बनाये हुए
हैं, जिन्हें सारा देश राजपूत मानता है, उनके रक्त में
आदिवासी खून है. समूचे पूर्वोत्तर में अहम जनसमुदाय के ग्यारहवीं सदी में असम आगमन से पहले आदिवासी ही थे...
पलाश विश्वास

हमारा दुर्भाग्य है कि निग्रोइड रक्तधारा के वाहक होकर
भी इस देश की गैर ब्राह्मणी अनार्य अश्वेत आम जनता के लिए इस देश के आदिवासी भिन्न ग्रह के लोग हैं और उनके भूगोल से बाकी देश का कोई संवाद नहीं है, न इसमें कहीं भी भारतीय संविधान लागू है. मसलन तेलंगाना के आदिवासियों ने जानकारी दी है कि वहां आदिवासी इलाकों में अब भी निजाम के जमाने के
कानून लागू हैं. राष्ट्र ने संविधान की पांचवी छठीं अनुसूचियों का इस्तेमाल सिर्फ जनादेश बनाने के काम में किया है और वह ऐसा जनादेश है,जो अस्पृश्य
भूगोल के विरुद्ध अनवरत युद्ध का पर्याय है.
सत्ता का रंग कुछ भी हो राष्ट्र के इस अवस्थान में कोई
परिवर्तन होता नहीं है. विकास के नाम पर आदिवासियों के विध्वंस से रची जाती है विकास गाथा. अब आदिवासी बोलते हैं तो लोगों को शिकायत होती है
कि आदिवासी बहुत बोलते हैं. सवाल यह है कि वे कौन लोग हैं जिन्हें आदिवासी आवाज से सख्त नफरत है.
विश्वविख्यात लेखिका अरुंधति राय आदिवासियों के हक में लिखती हैं तो अनुसूचित पिछड़े समुदायों के राजनीतिक लोग सीधे फतवा दे देते हैं कि वे तो ब्राह्मण हैं.

हिमांशु कुमार निरंतर आदिवासियों के हक हकूक की लड़ाई लड़ रहे हैं तो उनके अथक अवदान को खारिज करने के लिए एक ही ब्रह्मास्त्र काफी है कि वे तो गांधीवादी हैं.

साहित्य अकादमी पाने से पहले बंगाल का कुलीन विद्वत समाज महाश्वेता देवी के रचनाकर्म को साहित्य मानते ही नहीं थे. उनसे शिकायत रही है कि उनके लेखन में रचा कुछ नहीं गया, बल्कि उनका समूचा लेखन डाक्यूमेंटेशन है. जब पहला खाड़ी युद्ध शुरु होते ही इन पंक्तियों के लेखक ने अमेरिका से सावधान लिखना शुरू किया तो लोगों ने लाउड बता दिया या फिर यह कहते रहे कि यह तो सूचनाओं का घटाटोप है.
मेधा पाटकर लंबे समय से नर्मदा बांध के डूब में समाहित हो रही आदिवासी भूगोल की लड़ाई लड़ रही हैं, वे और तमाम लोग जो आदिवासियों की लड़ाई लड़ रहे हैं, यहां तक कि जनयुद्ध में शामिल माओवादियों और नक्सलियों तक को ब्राह्मण बताकर खारिज कर दिया जाता है. सवाल यह है कि आखिर आपत्ति किस बात से है? आदिवासी भूगोल की हक-हकूक, जल जंगल जमीन और आजीविका की लड़ाई से या फिर जो लोग उनकी आवाज उठा रहे हैं, उनके सामाजिक जाति परिचय से.

जाति वर्चस्व की मनुस्मृति व्यवस्था के मद्देनजर जाति परिचय का मुद्दा आपत्ति का कारण अवश्य होना चाहिये, क्योंकि राजनीति का अभिमुख यही है
कि ब्राहमणवादी तंत्र यंत्र को न केवल सही सलामत रख, बल्कि उसका हिस्सा बन सत्ता और बाजार में
अपना हिस्सा बूझ लेने के बाद अपने अंधभक्तों को जाति शत्रुओं को चिन्हाकर अपना जनाधार और कारोबार चालू रखा जा सकता है.

सवाल है कि जो आदिवासियों के हक हकूक की लड़ाई के ब्राह्मण स्वर के खिलाफ हैं, वे स्वयं आदिवासियों के सवाल पर किसके साथ खड़े हैं. वे आदिवासी भूगोल में क्यों नहीं खड़े हैं.
सवाल यह है कि जाति उन्मूलन के एजेंडे के साथ भारत में आर्य आक्रमण के इतिहास के साथ जो अंबेडकरी आंदोलन आजादी के बाद से निरंतर जारी है, उसकी आदिवासियों के हक-हकूक की लड़ाई में अब तक कोई भूमिका क्यों नहीं बन पायी और जब आदिवासी हक हकूक की लड़ाई की बात होती है तो ब्राह्मण ही क्यों नजर आता है.

ग्यारहवीं सदी तक अरावली, विंध्य के उस पार आर्यों का राज प्राचीन भारत के साम्राज्यों के गौरवशाली इतिहास के बावजूद कहीं नहीं था. राजस्थान में
तमाम किले आदिवासियों के ही बनाये हुए हैं, जिन्हें
सारा देश राजपूत मानता है, उनके रक्त में आदिवासी खून है.

समूचे पूर्वोत्तर में अहम जनसमुदाय के ग्यारहवीं सदी में असम आगमन से पहले आदिवासी ही थे. पूर्वी भारत में धर्मस्थल का हिंदूकरण बहुत बाद में हुआ अनार्य और आदिवासी देव देवियों के हिंदूकरण के मार्फत. बंगाल
तो ग्यारहवीं सदी तक बौद्धमय था और हिंदुत्व का कर्मकांड यहा पंद्रहवीं सदी में चैतन्य महाप्रभु और गौरांग के वैष्णव धर्म के तहत प्रारंभ हुआ.
नृतात्विक प्रमाण सिलसिलेवार हैं कि कैसे अनार्य नस्ल के मंगोलायड और निग्रोइड समुदायों के विभिन्न
आदिवासी समूहों का हिंदूकरण हुआ और वे बाद में अनुसूचित जनजातियों और पिछड़ी जातियों में शामिल हैं. अब भी विभिन्न राज्य में एक ही जाति के लोग मसलन गुज्जर कहीं अनुसूचित जाति, कहीं अनुसूचित
जनजाति तो कहीं पिछड़ी जाति और कहीं कहीं सवर्ण तक हैं.

ब्राह्मणों के मुकाबले असवर्ण गैरब्राह्मणों के
जिनिटेकेली आदिवासियों के साथ कहीं बहुत ज्यादा रक्त संबंध है, लेकिन अनुसूचित और पिछड़ी जातियां, उनके संगठन आदिवासियों की लड़ाई में कहां हैं. अंग्रेजी शासकों के युद्ध इतिहास में जो मिलिटरी गजट के नाम से मशहूर है, आदिवासी विद्रोहों का सिलसिलेवार विवरण है.

एक भी ब्यौरा ऐसा नहीं है जहां आदिवासियों की पीठ पर कोई घाव मिला है. उन्होंने हमेशा सारे वार अपने सीने पर झेले हैं और आखिरी आदमी के खेत होने से पहले तक उनकी लड़ाई कभी भी खत्म नहीं हुई है. इस इतिहास को देश की बाकी जनता अपना साझा गौरवशाली इतिहास अगर नहीं मानता, अगर आदिवासियों के स्वतंत्रतता संग्राम के तमम अध्याय हमारे इतिहास से बाहर हैं, तो हम एक राष्ट्र होने
का दावा कैसे करते हैं,इस पर भी विचारमंथन होना चाहिए.

गैर आदिवासी जनसंघर्षों में शामिल नेतृत्वकारी लोग
हमेशा सौदेबाजी और समझौते के अभ्यस्त रहे हैं. उनके जनसंघर्षों में पलायन का लंबा इतिहास है, तो क्या इस राष्ट्र में राष्ट्रीय जनआंदोलन के लिए आदिवासी नेतृत्व को स्वीकार कर लेने की हद तक लोकतांत्रिक हुआ जा सकता है.

जाति विमर्श से ज्यादा जरूरी मसला यह है कि आदिवासी समुदायों को राष्ट्र की मुख्यधारा में कैसे
लाया जाये और उनकी युद्ध परिस्थितियां कैसे खत्म
की जायें. जो लोग आदिवासियों के हक-हकूक की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनको गरियाते रहने से ज्यादा कारगर पहल यह होगी कि गैरब्राह्मण जातियां खुद आदिवासियों की लड़ाई में शामिल हों! यह आर्थिक अश्वमेध के वैदिकी हिंसा के समय सबसे बड़ी चुनौती है.

इतिहास गवाह है कि जो संगठन लोकतंत्र और संवाद से परहेज करते रहे हैं, जनसंघर्षों और जनसरोकारों से उनका दूर दूर का कोई नाता नहीं है. हालिया उदाहरण बंगाल में वामपंथी आंदोलन की आत्महत्या है. किसी भी स्तर पर संवाद से परहेज करते रहने से कब लाल जनाधार छीज गया, कब जन सरोकारों के बजाय कॉरपोरेट हितों का पर्याय बन गया संगठन, बूढे ब्राह्मण नेतृत्व को पता ही नहीं चला. उसी तरह किसी को खबर नहीं है कि अंबेडकर का नाम जापते जापते कब हमने अंबेडकर की विचारधारा और आंदोलन दोनों को तिलांजलि दे दी. बंगाल में सबसे ज्यादा अम्बेडकरी विचारधारा के सक्रिय कार्यकर्ता हैं और सबसे ज्यादा संगठन हैं,जिनके किसी दो समूहों के भी एक साथ बैठने का इतिहास नहीं है. नतीजा है कि जीवन के सभी क्षेत्रों में ब्राह्मण वर्चस्व का रोना रोने के बावजूद बंगाल शायद एकमात्र राज्य है, जहां आजादी के बाद से अब तक जीवन के किसी भी क्षेत्र में कोई अल्पसंख्यक,अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या पिछड़ी जाति का कोई प्रथम पुरुष या प्रथमनारी नहीं है.

परिवर्तन आता है तो हमारे ही मूलनिवासी बहुजन लोग, हमारे मतुआ संप्रदाय के लोग, दलित मुसलमान, पिछड़े और आदिवासी मिलकर बुद्धदेव भट्टाचार्य के बदले
ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री चुन लेते हैं. ये तमाम समुदाय अपने में से किसी को नेता मानने या अपने में से किसी की सुनने के लिए भी तैयार नहीं हैं. कुल मिलाकर बाकी देश में भी यही किस्सा है. बहुजन राज में उत्तर प्रदेश में जाति के आधार पर सबसे ज्यादा उत्पीड़न हुए, तो अंबेडकर जन्मदिन और अंबेडकर
तिरोधान दिवस को गणेशोत्सव की तर्ज पर धूम धड़ाके से मनाने वाले मराठी मूलनिवासी रिपब्लिकन पार्टी और
बामसेफ के हजार धड़ों के अलावा हजारों संगठनों में खंडित विखंडित हैं. हालत यह है कि सभी अंबेडकरी संगठनों के संयुक्त मोर्चा बनने के बजाय वहां शिवशक्ति और भीमशक्ति की युति बनते.

बाबा साहेब अगर जिंदा होते, तो इतना शर्मिंदा होते
कि बिना मधुमेह चुल्लूभर पानी में डूब जाते कि क्या समझकर उन्होंने मूक भारतीयों के हक हकूक की आवाज उठायी, जिन्हें अपनों से ही लड़ने से फुरसत नहीं मिलती!

मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों, समामाजिक शक्तियों, पेशेवर समूहों, आदिवासियों, पिछड़ों और
आदिवासी समूहों के साथ दलितों का साझा मोर्चा बनाने का जिम्मा तो हम लोगों ने वामपंथियों के हवाले कर दिया है और उनके ब्राह्मण नेताओं के मातहत संगठित हो जाने में हमें कोई दिक्कत नहीं होती. फिर भी हम सवाल खड़े करने वाले अपने ही लोगों को कम्युनिस्ट, कॉरपोरेट, संघी, ब्राह्मण, दलाल कुछ भी कहकर उसकी अलग आवाज तानाशाह ढंग से दबाने में
कोई परहेज नहीं करते. मसीहागिरि और प्रवचन के अंधभक्त भी हमी तो. एक दूसरे की खुफिया निगरानी, एक दूसरे के खिलाफ आरोप गढ़ने और उन्हें साबित करने में ही खप जाती है सारी ताकत.

दरअसल, हालत तो यह है कि भारत में ब्राह्मण अपने
जाति संस्कारों से ऊपर उठकर भी अगर ब्राह्मणवाद के
खिलाफ खड़े हो सकते हैं, तो हमारे लोग मूलनिवासी बहुजन और अंबेडकर के अनुयायी लोग ही हर कीमत पर ब्राह्मणवाद को जिंदा रखने पर उतारु है क्योंकि इसी जुगाड़ से उनका कारोबार और धंधा चलता है, ब्राह्मणों की सत्ता में भागीदारी मिल सकता है.
क्योंकि मुश्किल यह है कि अनुसूचित जातियों, पिछड़ों,
अल्पसंख्यकों और यहां तक कि जो आदिवासियों के संगठन चला रहे हैं, वे इस विचार से हमारी जानतकारी के मुताबिक कतई सहमत नहीं हैं और न कोई पहल इस दिशा में करने के लिए वे सात दशकों की हिमालयी भूल के बावजूद तैयार हैं.

अजब पाखंड है कि जिन्हें आप मूलनिवासी बहुजन
आबादी की मुख्य शक्ति वैचारिक स्तर पर मानते हैं और उनसे अपना इतिहास और रक्त संबंध जोड़ते हैं, हकीकत में आप अपनी बिरादरी में उन्हें शामिल करने को कतई तैयार नहीं हैं. संगठन चाहे जो बने हों, आप हमें एक उदाहरण देकर बतायें कि गैरब्राह्मण तमाम जनसमुदायों ने देश में कभी कोई साझा आंदोलन किया हो. यूं तो मसीहा संप्रदाय के लोग मुझे पहले से कॉरपोरेट एजंट और रामदास अठावले का अवतार
बता रहे हैं. इस यक्ष प्रश्न के बाद अगर देशभर में इन पंक्तियों के लेखक को ब्राह्मण घोषित कर दिया जाये तो ताज्जुब न होगा. इसी तरह जाति अस्मिता के संकीर्ण दायरे में हम अपने सरोकारों और बेहद जरुरी मुद्दों को अतिसरलीकृत फासीवादी रवैये के तहत तिलांजलि देकर वैश्विक त्रिइब्लिसी शैतानी तिलिस्म में माथा कूटते रहेंगे, प्रश्न यह भी है.

नियमागिरि पर सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है
या खनिज मामले में जैसे जमीन मालिक के अधिकारों को सुप्रीम कोर्ट ने स्थापित किया, उसके तहत भारतीय संविधान लागू करने के आदिवासियों के आंदोलन में
हां, ब्राह्मण वर्चस्व को दरकिनार करके कोई साझा आंदोलन मुक्तिकामी बहुजन मूलनिवासी अंबेडकरी कोई संगठन कब शुरू करें, इसका बेसब्री से इसका इंतजार है.


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